राजकोट।
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले सोमनाथ महादेव मंदिर पर हुए ऐतिहासिक आक्रमण को अब 1000 वर्ष पूरे हो गए हैं। वर्ष 1026 ईस्वी में गजनी के शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया था। यह हमला केवल एक मंदिर पर नहीं, बल्कि भारत की आस्था, संस्कृति और आत्मसम्मान पर किया गया आक्रमण माना जाता है।
भव्य मंदिर और अटूट श्रद्धा
सोमनाथ मंदिर उस समय अत्यंत भव्य और समृद्ध था। दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते थे और मंदिर की प्रतिष्ठा पूरे भारत में थी। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर में सोने-चांदी और बहुमूल्य रत्नों का अपार भंडार था। इसी लालच में महमूद गजनवी ने हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर सोमनाथ पर आक्रमण किया।
आक्रमण और विनाश
महमूद गजनवी ने अपने सैनिकों के साथ मंदिर पर हमला कर भारी लूटपाट की। मंदिर को तोड़ा गया, शिवलिंग को खंडित किया गया और बड़ी संख्या में लोगों की हत्या की गई। कहा जाता है कि गजनवी ने मंदिर से प्राप्त संपत्ति को ऊंटों पर लादकर गजनी ले जाया था। इसके बावजूद, लोगों की आस्था डगमगाई नहीं।
बार-बार टूटा, बार-बार बना
इतिहास गवाह है कि सोमनाथ मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए। लेकिन हर बार भारतीय समाज ने इसे फिर से खड़ा किया। मंदिर को बार-बार तोड़ा गया, लेकिन हर पुनर्निर्माण के साथ यह और अधिक भव्य बनता गया। यह मंदिर भारतीय संस्कृति की अमरता और साहस का प्रतीक बन गया।
आधुनिक सोमनाथ का निर्माण
आज का भव्य सोमनाथ मंदिर भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रेरणा से पुनर्निर्मित हुआ। वर्ष 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा था कि “सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत की आत्मा के पुनर्जागरण का प्रतीक है।”
आस्था का प्रतीक
आज सोमनाथ मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि आस्था को तलवार से नहीं मिटाया जा सकता। हजार साल बाद भी सोमनाथ उतना ही भव्य है और श्रद्धालुओं के हृदय में उतना ही जीवित है।
सोमनाथ का इतिहास हमें सिखाता है कि लुटेरे मंदिर तोड़ सकते हैं, लेकिन विश्वास और संस्कृति को कभी नहीं तोड़ सकते।
