पिछले दो दशकों में भारतीय कंपनियों द्वारा किए गए बड़े विदेशी अधिग्रहण (Acquisitions) निवेशकों के लिए उम्मीद के मुताबिक फायदे नहीं दे पाए हैं। एक हालिया विश्लेषण के अनुसार, 10 में से 8 कंपनियां अपने भारी-भरकम निवेश के बावजूद शेयरधारकों को बाजार से बेहतर रिटर्न देने में असफल रही हैं।
सिर्फ 2 कंपनियां ही रही सफल
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल दो कंपनियां—
- Hindalco Industries
- Bharti Airtel
ही ऐसी रहीं, जिन्होंने अपने अधिग्रहण के बाद बाजार से बेहतर प्रदर्शन किया।
👉 हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इनका बेहतर प्रदर्शन भी सीधे अधिग्रहण का परिणाम नहीं, बल्कि अन्य फैक्टर्स का असर है।
Hindalco का केस: Novelis डील
Hindalco Industries ने 2007 में Novelis को 5.7 बिलियन डॉलर में खरीदा था।
- 17 साल बाद शेयर में 583% की बढ़ोतरी
- इसी दौरान Nifty 50 में 474% की तेजी
👉 लेकिन यह बढ़त मुख्य रूप से ग्लोबल मेटल प्राइस में उछाल के कारण मानी जा रही है, न कि केवल अधिग्रहण की वजह से।
Bharti Airtel: Zain Telecom डील
Bharti Airtel ने 2010 में Zain Telecom का अफ्रीकी कारोबार 10.7 बिलियन डॉलर में खरीदा।
- शेयर में 573% की वृद्धि
- इसी अवधि में Nifty में 359% बढ़त
👉 यहां भी हाल के वर्षों में भारत के टेलीकॉम सेक्टर में मजबूती को मुख्य कारण माना जा रहा है।
बाकी कंपनियां क्यों रहीं पीछे?
इन कंपनियों ने भारी निवेश के बावजूद बाजार से कमजोर प्रदर्शन किया:
- Tata Steel (Corus डील)
- Tata Motors (Jaguar Land Rover)
- ONGC (Imperial Energy)
- UPL
- Reliance Industries
- Biocon
- Coforge
- Adani Green Energy
👉 इन सभी के शेयर प्रदर्शन ने बेंचमार्क इंडेक्स को पीछे नहीं छोड़ा।
Tata Steel और ONGC के उदाहरण
- Tata Steel ने 2006 में Corus को 12.78 बिलियन डॉलर में खरीदा
- शेयर वृद्धि: 397%
- Nifty वृद्धि: 551%
- ONGC ने 2008 में Imperial Energy खरीदी
- शेयर वृद्धि: 78%
- Nifty वृद्धि: 458%
👉 साफ है कि बड़े निवेश के बावजूद रिटर्न कमजोर रहा।
क्यों फेल हुए ये अधिग्रहण?
विश्लेषकों के अनुसार मुख्य कारण हैं:
- 💰 शुरुआती निवेश (Capital Cost) बहुत ज्यादा
- 📉 अधिग्रहित कंपनियों से अपेक्षित कमाई नहीं
- 🌍 ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितता
- ⚖️ निवेश और रिटर्न के बीच असंतुलन
👉 यानी कंपनियों ने जितना खर्च किया, उतना फायदा नहीं मिला।
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
- बड़े अधिग्रहण हमेशा फायदे का सौदा नहीं होते
- लॉन्ग टर्म में भी जोखिम बना रहता है
- कंपनी के फंडामेंटल और सेक्टर ट्रेंड ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं
भारतीय कंपनियों के बड़े विदेशी अधिग्रहण निवेशकों के लिए अपेक्षित लाभ नहीं दे पाए हैं। सिर्फ कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो ज्यादातर कंपनियां बाजार से पीछे रह गई हैं। इससे साफ है कि किसी भी बड़े निवेश में रणनीति, समय और बाजार की स्थिति का संतुलन बेहद जरूरी होता है।
