एशियाई मुद्राओं में भारी गिरावट, ईरान तनाव के बीच रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा भारतीय रुपया

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर अब एशियाई मुद्राओं पर साफ दिखाई देने लगा है। मंगलवार को एशियाई करेंसी बाजार में भारी दबाव देखने को मिला, जबकि भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। निवेशकों की चिंता बढ़ने, विदेशी पूंजी निकासी और मजबूत डॉलर के कारण रुपया रिकॉर्ड गिरावट का सामना कर रहा है।

रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया

मंगलवार के शुरुआती कारोबार में USD/INR जोड़ी 95.62 के स्तर तक पहुंच गई, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। हालांकि बाद में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संभावित हस्तक्षेप के संकेत मिलने के बाद रुपये में थोड़ी रिकवरी देखी गई।

विश्लेषकों के अनुसार भारतीय रुपया 2026 में एशिया की सबसे कमजोर प्रमुख मुद्राओं में शामिल हो चुका है। केवल इस वर्ष में रुपया लगभग 5 प्रतिशत तक टूट चुका है।

ईरान तनाव और तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता

बाजार में सबसे बड़ी चिंता अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को लेकर है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के प्रस्ताव को “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया, जिसके बाद निवेशकों को डर है कि मध्य पूर्व में संघर्ष और बढ़ सकता है।

इस तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। Brent Crude Oil 107 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। भारत अपनी लगभग 85 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये दोनों पर दबाव बढ़ा रही हैं।

एशियाई मुद्राओं में भी कमजोरी

केवल भारतीय रुपया ही नहीं, बल्कि दक्षिण कोरियाई वॉन, इंडोनेशियाई रुपिया, फिलीपींस पेसो और अन्य एशियाई मुद्राओं में भी कमजोरी दर्ज की गई। तेल आयात करने वाले देशों की करेंसी पर सबसे ज्यादा दबाव देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं, तो एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी

भारतीय बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह बन रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान संकट शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 20 अरब डॉलर से ज्यादा की निकासी की है।

सोमवार को ही विदेशी निवेशकों ने करीब 900 मिलियन डॉलर की बिकवाली की, जिससे शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली। Nifty 50 और Sensex दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई।

RBI और सरकार क्या कर सकती है?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए डॉलर बेचकर हस्तक्षेप कर सकता है। इसके अलावा सरकार विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए आयात नियंत्रण और ईंधन खपत कम करने जैसे कदम उठा सकती है।

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी ईंधन खपत कम करने, गैर-जरूरी यात्रा घटाने और आयात सीमित करने की अपील की है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम किया जा सके।

अमेरिकी CPI डेटा पर बाजार की नजर

इस सप्ताह अमेरिकी महंगाई (CPI) आंकड़े भी बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। यदि अमेरिका में महंगाई अपेक्षा से अधिक रहती है, तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है। इससे डॉलर और मजबूत हो सकता है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है।

क्या 100 के पार जा सकता है डॉलर?

बाजार विशेषज्ञों के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि तेल संकट और विदेशी पूंजी निकासी जारी रही तो डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के स्तर के करीब भी पहुंच सकता है। हालांकि RBI की सक्रिय भूमिका फिलहाल रुपये की गिरावट को सीमित करने की कोशिश कर रही है।

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