बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: SEBI को RTI के जवाब के लिए एक्सचेंज से जानकारी जुटाना जरूरी नहीं

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत केवल RTI आवेदन का जवाब देने के लिए बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) जैसी तीसरी पार्टी से जानकारी जुटाने या हासिल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति मनीष पिटाले और न्यायमूर्ति श्रीराम वी. शिरसाट शामिल थे, ने मंगलवार को अपने फैसले में SEBI और BSE की ओर से दायर नौ रिट याचिकाओं को मंजूर कर लिया। अदालत ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें SEBI को BSE से जानकारी हासिल कर RTI आवेदकों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।

RTI के तहत क्या जानकारी देने के लिए बाध्य है प्राधिकरण?

अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या RTI कानून के तहत कोई सार्वजनिक प्राधिकरण किसी निजी संस्था से जानकारी जुटाकर उसे RTI आवेदक को देने के लिए बाध्य है।

ये मामले तब सामने आए जब कई RTI आवेदकों ने SEBI से ऐसी जानकारी मांगी, जिसके लिए बाजार नियामक को BSE से रिकॉर्ड हासिल करने पड़ते। CIC ने माना था कि SEBI की जिम्मेदारी है कि वह BSE से ऐसी जानकारी प्राप्त करके RTI आवेदकों को उपलब्ध कराए।

हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस व्याख्या को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक प्राधिकरण का दायित्व उस जानकारी को उपलब्ध कराने तक सीमित है, जो RTI आवेदन किए जाने के समय उसके पास मौजूद है और जो कानून में दिए गए अपवादों के अधीन सार्वजनिक की जा सकती है।

SEBI को तीसरे पक्ष से जानकारी लेने की बाध्यता नहीं

RTI अधिनियम की धारा 8 का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत SEBI जैसे नियामक निकाय को अपने अधिकारों के तहत किसी तीसरे पक्ष से जानकारी हासिल करके RTI आवेदक को उपलब्ध कराना अनिवार्य हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि SEBI को अपने नियामक अधिकारों के तहत BSE या किसी अन्य संस्था से जानकारी मांगने का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे हर RTI आवेदन के जवाब के लिए ऐसी जानकारी अनिवार्य रूप से जुटानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि RTI अधिनियम के तहत किसी सार्वजनिक प्राधिकरण के पास मौजूद और उपलब्ध जानकारी तक ही पहुंच का अधिकार है। RTI कानून किसी प्राधिकरण को ऐसी जानकारी जुटाने या इकट्ठा करने के लिए बाध्य नहीं करता, जो उसके रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि RTI अधिनियम की धारा 2(f) में ‘सूचना’ की परिभाषा व्यापक है। इसमें किसी निजी संस्था से संबंधित ऐसी जानकारी भी शामिल हो सकती है, जिसे कोई सार्वजनिक प्राधिकरण किसी अन्य कानून के तहत हासिल कर सकता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सार्वजनिक प्राधिकरण को प्रत्येक RTI आवेदक के लिए निजी संस्था से वह जानकारी हासिल करनी ही होगी।

अदालत ने संविधान पीठ के उस स्पष्टीकरण का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार किसी निजी संस्था से संबंधित जानकारी RTI अधिनियम के तहत तभी उपलब्ध मानी जा सकती है, जब संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण को कानूनन उस जानकारी तक पहुंच हासिल हो।

प्राधिकरण को नई जानकारी तैयार करने की जरूरत नहीं

फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि RTI अधिनियम सार्वजनिक प्राधिकरणों को नई जानकारी बनाने, संकलित करने या तैयार करने के लिए बाध्य नहीं करता। इसी तरह किसी उपलब्ध रिकॉर्ड से नई व्याख्या निकालना, अनुमान लगाना या ऐसी राय देना भी जरूरी नहीं है, जो पहले से उसके रिकॉर्ड का हिस्सा न हो।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि CIC ने बाद में खुद ऐसे आदेश पारित किए थे, जो सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के अनुरूप थे। इन मामलों में CIC ने सार्वजनिक प्राधिकरणों, जैसे SEBI, को तीसरे पक्ष से जानकारी हासिल करने का निर्देश देने से इनकार किया था।

CIC के सभी नौ आदेश रद्द

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि CIC के संबंधित आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट की गई कानूनी स्थिति के विपरीत थे। इसलिए हाईकोर्ट ने SEBI और BSE की सभी नौ रिट याचिकाओं को मंजूर करते हुए CIC के आदेशों को रद्द कर दिया।

यह फैसला SEBI जैसे नियामकों के लिए RTI कानून के तहत उनकी जिम्मेदारियों की सीमा को स्पष्ट करता है। यानी किसी सार्वजनिक प्राधिकरण के पास पहले से मौजूद जानकारी, कानून में दिए गए अपवादों के अधीन, RTI के तहत उपलब्ध करानी पड़ सकती है। लेकिन RTI कानून किसी नियामक को आवेदकों के लिए निजी संस्थाओं के रिकॉर्ड जुटाने वाली एजेंसी में नहीं बदलता।

NSE को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का भी जिक्र

हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने NSE से जुड़े एक मामले में फैसला दिया था कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) RTI अधिनियम के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ की श्रेणी में आता है।

दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले ने भारत के शेयर बाजार के बुनियादी ढांचे को लेकर एक व्यापक सवाल खड़ा किया था कि यदि किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज पर सरकार और SEBI का व्यापक वैधानिक और नियामकीय नियंत्रण है, तो क्या उसे RTI के दायरे में लाया जा सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी है और यह मामला अभी शीर्ष अदालत में लंबित है।

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