भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर एक बार फिर तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। बांग्लादेश सरकार ने पद्मा नदी पर एक बड़े डैम प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। पद्मा नदी को भारत में गंगा नदी के नाम से जाना जाता है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भारत के फरक्का बैराज के प्रभाव को कम करना और बांग्लादेश में पानी की कमी की समस्या से निपटना बताया जा रहा है।
बांग्लादेश की National Economic Council की Executive Committee (ECNEC) ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पहले चरण को मंजूरी दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार इस डैम प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 34,497.25 करोड़ टका रखी गई है और इसे पूरी तरह बांग्लादेश सरकार के फंड से तैयार किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट वर्ष 2033 तक पूरा होने की संभावना है।
भारत से चर्चा करने से साफ इनकार
सबसे बड़ी बात यह रही कि बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री Shahiduddin Chowdhury Ani ने साफ कहा कि यह परियोजना पूरी तरह बांग्लादेश के राष्ट्रीय हित से जुड़ी हुई है और इसके लिए भारत से किसी प्रकार की चर्चा की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच सामान्य स्तर की बातचीत जारी है। लेकिन डैम प्रोजेक्ट को लेकर बांग्लादेश अपने फैसले पर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान दोनों देशों के बीच भविष्य में जल कूटनीति को और संवेदनशील बना सकता है, खासकर ऐसे समय में जब 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने वाली है।
फरक्का बैराज को लेकर लंबे समय से नाराज है बांग्लादेश
बांग्लादेश का आरोप है कि भारत द्वारा पश्चिम बंगाल में 1975 में बनाए गए फरक्का बैराज के कारण सूखे मौसम में उसके हिस्से में आने वाले पानी की मात्रा काफी कम हो जाती है।
बांग्लादेश के अनुसार गंगा नदी में पानी का प्रवाह घटने से देश के कई इलाकों में सिंचाई प्रभावित हुई है। साथ ही नदियों में समुद्री खारे पानी का प्रवेश बढ़ गया है, जिससे कृषि भूमि की उर्वरता कम हो रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण-पश्चिम बांग्लादेश में जल संकट और मिट्टी की बढ़ती खारापन समस्या लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई है।
किन क्षेत्रों को मिलेगा फायदा?
बांग्लादेश सरकार के मुताबिक यह डैम प्रोजेक्ट देश के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए लाभकारी साबित होगा। इससे राजशाही, ढाका और बरिसाल डिवीजन के जिलों में जल भंडारण क्षमता बढ़ाई जा सकेगी।
सरकार का दावा है कि परियोजना के जरिए सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और बाढ़ नियंत्रण में मदद मिलेगी। साथ ही कृषि उत्पादन को भी स्थिर रखने में सहायता मिल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून के दौर में बांग्लादेश भविष्य की जल सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बड़े जल संरचना प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम कर रहा है।
1996 की गंगा जल संधि पर फिर बढ़ेगी चर्चा
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर 1996 में 30 वर्षीय समझौता हुआ था। इस संधि के तहत दोनों देशों के बीच फरक्का बैराज से छोड़े जाने वाले पानी के वितरण का फॉर्मूला तय किया गया था।
अब यह समझौता दिसंबर 2026 में समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच नई संधि को लेकर बातचीत तेज हो सकती है।
हालांकि बांग्लादेश द्वारा भारत से चर्चा के बिना इतने बड़े डैम प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से संकेत मिल रहे हैं कि ढाका अब जल प्रबंधन के मामलों में ज्यादा आक्रामक और आत्मनिर्भर रणनीति अपनाना चाहता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मुद्दा?
गंगा नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए आर्थिक, कृषि और सामाजिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी बड़े जल प्रोजेक्ट का असर सीमा पार जल प्रवाह पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच समन्वय नहीं हुआ तो भविष्य में जल विवाद और गंभीर हो सकते हैं। खासकर ऐसे समय में जब दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन, जल संकट और बढ़ती आबादी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
भारत के लिए यह मामला केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि गंगा बेसिन करोड़ों लोगों की आजीविका और कृषि व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
