RBI Repo Rate: लगातार दूसरी बार रेपो रेट स्थिर, होम और कार लोन की EMI में नहीं होगा कोई बदलाव

अगर आपने होम लोन, कार लोन या किसी अन्य प्रकार का पर्सनल लोन लिया है या लेने की योजना बना रहे हैं, तो आपके लिए राहत भरी खबर है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा ने घोषणा की है कि इस बार भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। रेपो रेट को 5.25% पर ही बरकरार रखा गया है।

इस फैसले का सीधा असर यह होगा कि फिलहाल होम लोन, ऑटो लोन और अन्य फ्लोटिंग ब्याज दर वाले लोन की EMI में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। जून महीने के बाद लगातार दूसरी बार RBI ने रेपो रेट को स्थिर रखा है, जिससे आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।

इस साल रेपो रेट में क्या बदलाव हुए?

गौरतलब है कि इससे पहले जून में हुई MPC बैठक में भी RBI ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया था। वहीं, वर्ष 2025 के दौरान केंद्रीय बैंक ने अर्थव्यवस्था को गति देने और कर्ज लेने वालों को राहत देने के लिए चरणबद्ध तरीके से कुल 125 बेसिस पॉइंट (1.25%) की कटौती की थी।

इस कटौती के बाद रेपो रेट घटकर 5.25% पर आ गया था और अब RBI ने इसे यथावत बनाए रखने का फैसला किया है।

क्या होता है रेपो रेट?

रेपो रेट वह ब्याज दर होती है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक देश के वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है।

जब RBI रेपो रेट में बदलाव करता है, तो उसका सीधा असर बैंकों की उधारी लागत और ग्राहकों को मिलने वाले लोन की ब्याज दरों पर पड़ता है।

जब रेपो रेट बढ़ता है

  • बैंकों के लिए RBI से पैसा उधार लेना महंगा हो जाता है।
  • बैंक ग्राहकों के लिए होम, कार और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं।
  • इससे ग्राहकों की मासिक EMI भी बढ़ जाती है।

जब रेपो रेट स्थिर रहता है

  • बैंकों की उधारी लागत में कोई बदलाव नहीं होता।
  • लोन की ब्याज दरें सामान्यतः स्थिर रहती हैं।
  • मौजूदा लोनधारकों की EMI में कोई अतिरिक्त बढ़ोतरी नहीं होती।

RBI क्यों लेता है रेपो रेट पर फैसला?

भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठकों के माध्यम से रेपो रेट की समीक्षा करता है। इसका मुख्य उद्देश्य महंगाई (Inflation) और आर्थिक विकास (Economic Growth) के बीच संतुलन बनाए रखना होता है।

रेपो रेट में बदलाव या उसे स्थिर रखने का फैसला देश की आर्थिक स्थिति, महंगाई के स्तर और वित्तीय बाजारों को ध्यान में रखकर लिया जाता है।

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