लैब ग्रोन डायमंड को लेकर ब्रिटेन में सख्ती: भ्रामक विज्ञापन पर दो बड़ी ज्वेलरी कंपनियों पर कार्रवाई

ब्रिटेन में लैब ग्रोन डायमंड (LGD) को लेकर भ्रामक विज्ञापन करने वाली ज्वेलरी कंपनियों पर बड़ी कार्रवाई की गई है। ब्रिटेन की Advertising Standards Authority (ASA) ने दो प्रमुख ज्वेलरी कंपनियों के खिलाफ कड़ा कदम उठाते हुए उनके विज्ञापनों पर रोक लगा दी है। इन कंपनियों पर आरोप है कि इन्होंने लैब ग्रोन डायमंड को “ब्रिलियंट डायमंड” और “सस्टेनेबल” जैसे शब्दों से प्रचारित किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि ये प्राकृतिक हीरे नहीं बल्कि लैब में तैयार किए गए डायमंड हैं।

ASA की इस कार्रवाई के बाद वैश्विक ज्वेलरी उद्योग में नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब लैब ग्रोन डायमंड बेचने वाली कंपनियों को अपने विज्ञापनों और मार्केटिंग में अधिक पारदर्शिता बरतनी होगी।

किन कंपनियों पर हुई कार्रवाई?

रिपोर्ट के अनुसार ASA ने ब्रिटेन की ज्वेलरी कंपनी Lark & Berry और Novita Diamonds के खिलाफ कार्रवाई की है। दोनों कंपनियों के विज्ञापनों और सोशल मीडिया प्रमोशन में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जिससे उपभोक्ताओं को भ्रम हो सकता था कि वे प्राकृतिक हीरे खरीद रहे हैं।

ASA ने कहा कि विज्ञापनों में यह स्पष्ट रूप से बताना जरूरी है कि डायमंड “Lab-grown” या “Synthetic” हैं। केवल “Diamond” शब्द का इस्तेमाल उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकता है।

क्या था विवाद?

Lark & Berry ने अपने विज्ञापनों में “Brilliant Diamonds” और “Sustainable Diamonds” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। हालांकि कंपनी ने कहीं भी साफ तौर पर यह नहीं बताया कि ये लैब में तैयार किए गए हीरे हैं।

इसी तरह Novita Diamonds के सोशल मीडिया विज्ञापनों में भी ऐसे दावे किए गए थे, जिनसे यह आभास होता था कि लैब ग्रोन डायमंड और प्राकृतिक हीरे में कोई खास अंतर नहीं है।

ASA का कहना है कि सामान्य उपभोक्ता “Diamond” शब्द को प्राकृतिक हीरे के रूप में समझ सकता है। इसलिए कंपनियों को स्पष्ट और पारदर्शी जानकारी देना अनिवार्य है।

लैब ग्रोन डायमंड क्या होते हैं?

Lab-grown Diamonds वे हीरे होते हैं जिन्हें अत्याधुनिक तकनीक की मदद से प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है। इनका रासायनिक और भौतिक स्वरूप काफी हद तक प्राकृतिक हीरों जैसा होता है।

हालांकि इनकी उत्पत्ति प्राकृतिक हीरों से अलग होती है। प्राकृतिक हीरे धरती के अंदर लाखों वर्षों में बनते हैं, जबकि लैब ग्रोन डायमंड कुछ हफ्तों या महीनों में तैयार किए जा सकते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में कम कीमत और पर्यावरणीय दावों के कारण लैब ग्रोन डायमंड की मांग तेजी से बढ़ी है।

‘Sustainable’ दावे पर भी उठे सवाल

ASA ने यह भी कहा कि कंपनियां बिना पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण के “Sustainable” या “Eco-friendly” जैसे दावे नहीं कर सकतीं।

विशेषज्ञों के अनुसार लैब ग्रोन डायमंड बनाने में भारी मात्रा में बिजली और ऊर्जा का इस्तेमाल होता है। ऐसे में उन्हें पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल बताना भ्रामक हो सकता है।

हालांकि लैब ग्रोन डायमंड उद्योग का दावा है कि खनन आधारित प्राकृतिक हीरों की तुलना में उनका पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है।

वैश्विक ज्वेलरी इंडस्ट्री पर पड़ेगा असर

ब्रिटेन की इस कार्रवाई को वैश्विक ज्वेलरी बाजार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में अमेरिका, यूरोप और एशिया के अन्य देशों में भी लैब ग्रोन डायमंड के विज्ञापन नियम और सख्त हो सकते हैं।

भारत, चीन और अमेरिका इस समय लैब ग्रोन डायमंड उत्पादन और व्यापार के बड़े केंद्र बन चुके हैं। भारत सरकार भी लैब ग्रोन डायमंड उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है।

लेकिन अब पारदर्शिता और उपभोक्ता सुरक्षा के नियमों पर अधिक जोर दिया जा सकता है।

ग्राहकों के लिए क्या जरूरी?

विशेषज्ञों का कहना है कि डायमंड खरीदते समय ग्राहकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह प्राकृतिक हीरा है या लैब ग्रोन। इसके लिए प्रमाणित सर्टिफिकेट और विश्वसनीय ज्वेलरी ब्रांड का चयन करना जरूरी है।

Gemological Institute और अन्य प्रमाणन एजेंसियां डायमंड की पहचान और गुणवत्ता तय करने के लिए विशेष प्रमाणपत्र जारी करती हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक उपभोक्ताओं को विज्ञापन के बजाय प्रमाणित जानकारी के आधार पर खरीदारी करनी चाहिए।

ज्वेलरी बाजार में बढ़ेगी पारदर्शिता

ASA की कार्रवाई के बाद माना जा रहा है कि ज्वेलरी कंपनियों को अब अपने विज्ञापनों में अधिक स्पष्ट भाषा का इस्तेमाल करना होगा। “Lab-grown”, “Synthetic” और “Artificial” जैसे शब्दों का स्पष्ट उल्लेख करना आवश्यक हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ेगा और ज्वेलरी उद्योग में पारदर्शिता मजबूत होगी।

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