भारत में खुदरा महंगाई दर अप्रैल में घटकर 3.48 प्रतिशत पर आ गई है, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4 प्रतिशत लक्ष्य से नीचे है। पहली नजर में यह आंकड़ा आम लोगों और सरकार दोनों के लिए राहत की खबर माना जा रहा है। लगातार बढ़ती खाद्य और ईंधन कीमतों से परेशान जनता को इससे कुछ राहत मिली है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई का असली संकट अभी खत्म नहीं हुआ है और आने वाले महीनों में RBI के लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
दरअसल, अप्रैल में खुदरा महंगाई कम जरूर हुई, लेकिन इसके पीछे कई अस्थायी कारण हैं। खाद्य महंगाई में कुछ नरमी देखने को मिली है, लेकिन सब्जियों की कीमतों में अस्थिरता अब भी बनी हुई है। भारत में महंगाई का सबसे बड़ा कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतें रही हैं और RBI ब्याज दरें बढ़ाकर महंगाई को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन वह प्याज और टमाटर का उत्पादन नहीं बढ़ा सकता।
आयातित महंगाई का खतरा बढ़ा
विशेषज्ञों के अनुसार अब भारत के सामने “इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन” यानी आयातित महंगाई का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। ईरान युद्ध और वैश्विक तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, सोना और चांदी की कीमतों में तेज उछाल आया है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावनाओं ने भी वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है।
दूसरी ओर, भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है। कमजोर रुपये की वजह से आयात महंगा हो जाता है, जिससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल, गैस और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ता है।
रेस्तरां और सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी
ईरान युद्ध के कारण एलपीजी सिलेंडर महंगे हुए हैं, जिसका असर अब होटल और रेस्तरां उद्योग पर दिखाई देने लगा है। कई रेस्तरां ने खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि कंपनियों और सेवा क्षेत्र की बढ़ती लागत अब उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो सेवाओं से जुड़ी महंगाई आने वाले महीनों में और बढ़ सकती है। यह RBI के लिए चिंता का बड़ा कारण बन सकता है।
RBI के लिए मुश्किल संतुलन
RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की अगली बैठक अगले महीने होने वाली है। फिलहाल केंद्रीय बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह विकास और महंगाई के बीच संतुलन कैसे बनाए।
अगर RBI जल्दबाजी में ब्याज दरों में कटौती करता है, तो महंगाई फिर तेजी से बढ़ सकती है। वहीं यदि लंबे समय तक सख्त नीति अपनाई जाती है तो आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि RBI फिलहाल बेहद सतर्क रुख अपनाएगा और जल्द किसी बड़े राहत पैकेज या दर कटौती की संभावना कम दिखाई देती है।
कच्चा तेल बना सबसे बड़ा खतरा
भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम कच्चे तेल की कीमतें हैं। पिछले एक साल में भारत को कम तेल कीमतों का फायदा मिला था, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक उछाल देखा गया है।
यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है, तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल और परिवहन लागत बढ़ेगी। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा।
मानसून भी बना चिंता का कारण
भारत की महंगाई काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। मौसम एजेंसियों ने समय से पहले एल नीनो (El Nino) की आशंका जताई है, जिससे मानसून कमजोर हो सकता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान दिया है।
यदि मानसून कमजोर रहता है या खरीफ फसल प्रभावित होती है, तो खाद्य महंगाई फिर तेजी से बढ़ सकती है। इससे आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ेगा।
RBI के सामने ‘परफेक्ट स्टॉर्म’
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल RBI के सामने “परफेक्ट स्टॉर्म” जैसी स्थिति बन रही है। एक तरफ महंगाई नियंत्रण में दिख रही है, वहीं दूसरी ओर कच्चा तेल, कमजोर रुपया, युद्ध, कमजोर मानसून और सेवाओं की बढ़ती लागत भविष्य में महंगाई को फिर बढ़ा सकती है।
ऐसे में RBI के लिए अगला कुछ महीनों का दौर बेहद अहम रहने वाला है। केंद्रीय बैंक को हर कदम बेहद सावधानी से उठाना होगा ताकि महंगाई भी नियंत्रण में रहे और आर्थिक विकास भी प्रभावित न हो।
