Surat Nasirnagar Demolition Case: सूरत के नासिरनगर क्षेत्र में रातोंरात किए गए कथित अवैध ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) के मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति निखिल एस. करियल ने सूरत महानगरपालिका (एसएमसी) सहित सभी संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी मकान को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना नहीं तोड़ा जा सकता।
पीड़ितों को देनी होगी वैकल्पिक आवास व्यवस्था
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि सूरत महानगरपालिका द्वारा बिना वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए मकानों को ध्वस्त किया गया है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी मनपा और संबंधित अधिकारियों की होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों के घर तोड़े गए हैं, उन्हें उचित आवास या वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध करानी होगी। मामले की अगली सुनवाई सोमवार को निर्धारित की गई है।
किन-किन पक्षों को बनाया गया पक्षकार?
नासिरनगर ध्वस्तीकरण मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत महानगरपालिका के अलावा सूरत पुलिस आयुक्त, सूरत एसओजी के डीसीपी राजदीपसिंह नकुम और टोरेंट पावर सहित अन्य संबंधित पक्षों को भी मामले में शामिल किया है। अदालत ने सभी से जवाब मांगा है कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई किस आधार पर की गई।
बिना नोटिस 150 से अधिक मकान किए गए ध्वस्त
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि 30 मई 2026 को सूरत महानगरपालिका के अधिकारियों ने बिना किसी पूर्व सूचना, नोटिस या पंचनामा के 150 से अधिक मकानों को रातोंरात ध्वस्त कर दिया। स्थानीय निवासियों को न तो अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया और न ही घर का सामान हटाने का समय।
हाईकोर्ट के सवाल और याचिकाकर्ताओं के गंभीर आरोप
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि यह कैसे साबित किया जा सकता है कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई सूरत मनपा ने ही कराई थी। इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं ने बताया कि कार्रवाई के दौरान मनपा के वरिष्ठ अधिकारी और 20 से 25 पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद थे।
इसके बाद न्यायमूर्ति निखिल करियल ने पूछा कि ध्वस्तीकरण में इस्तेमाल की गई मशीनरी और श्रमिक किसके थे। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि पूरी कार्रवाई मनपा से जुड़ी एजेंसी द्वारा की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ध्वस्तीकरण शुरू होने से पहले टोरेंट पावर ने क्षेत्र की बिजली काट दी थी तथा पालिया बिल्डर के निर्देश पर ‘श्री राम एजेंसी’ ने पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि घटनास्थल पर आर्किटेक्ट रजनीकांत भी मौजूद थे।
अदालत पहुंचने में देरी क्यों हुई?
हाईकोर्ट ने यह भी पूछा कि यदि मकान 30 मई को तोड़े गए थे, तो अदालत में याचिका दायर करने में देरी क्यों हुई। इस पर पीड़ितों ने बताया कि सबसे पहले उन्होंने सूरत मनपा आयुक्त से शिकायत की थी। पीड़ितों के अनुसार आयुक्त ने कहा कि उनके कार्यालय की ओर से ऐसे किसी ध्वस्तीकरण का आदेश जारी नहीं किया गया था।
इसके बाद प्रभावित लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया, लेकिन उनकी शिकायत स्वीकार नहीं की गई। प्रशासनिक और पुलिस स्तर पर राहत न मिलने के बाद अंततः उन्होंने न्याय की मांग को लेकर गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मामले पर सबकी नजर
नासिरनगर ध्वस्तीकरण मामला अब गुजरात में एक हाई-प्रोफाइल कानूनी विवाद बन गया है। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद इस मामले में प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आगामी सुनवाई में अदालत के समक्ष कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने की संभावना है।
