जून में शेयर बाजार की रफ्तार हुई धीमी, कैश सेगमेंट का कारोबार 7% घटा; F&O में बढ़ी हलचल
नई दिल्ली/अहमदाबाद: मई 2026 में 22 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद जून में भारतीय शेयर बाजार की रफ्तार कुछ धीमी पड़ गई। निवेशकों के सतर्क रुख और नए सकारात्मक संकेतों की कमी के कारण कैश मार्केट में ट्रेडिंग गतिविधियां कमजोर रहीं। हालांकि दूसरी ओर फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में कारोबार में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि निवेशकों का झुकाव जोखिम प्रबंधन और शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग की ओर बढ़ रहा है।
कैश मार्केट में 7% की गिरावट
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के इक्विटी कैश सेगमेंट में जून के दौरान औसत दैनिक कारोबार (Average Daily Turnover) घटकर 1.41 लाख करोड़ रुपये रह गया। यह मई की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत कम है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह गिरावट लगातार तीन महीनों की तेजी के बाद आई है। निवेशकों ने वैश्विक अनिश्चितताओं और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच नए निवेश करने के बजाय इंतजार करना बेहतर समझा।
F&O सेगमेंट में 3% की बढ़ोतरी
जहां कैश मार्केट कमजोर रहा, वहीं फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में औसत दैनिक कारोबार लगभग 3 प्रतिशत बढ़कर 500.6 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।
विश्लेषकों का कहना है कि महीने के अंतिम एक्सपायरी सप्ताह में ट्रेडिंग गतिविधियां तेज होने से डेरिवेटिव्स वॉल्यूम में वृद्धि देखने को मिली। हालांकि पूरे महीने के दौरान F&O ट्रेडिंग सामान्य से धीमी रही थी।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली बनी बड़ी वजह
जून के दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार में लगातार बिकवाली जारी रखी। इसका सबसे अधिक असर लार्ज-कैप और ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील सेक्टरों पर देखने को मिला।
FII की बिकवाली के कारण बाजार में अस्थिरता बढ़ी और निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ। इसका असर प्रमुख सूचकांकों पर भी दिखाई दिया।
सेंसेक्स और निफ्टी में रहा उतार-चढ़ाव
पूरे जून महीने के दौरान भारतीय शेयर बाजार में काफी अस्थिरता रही।
- निफ्टी 24,000 के आसपास कारोबार करता रहा।
- सेंसेक्स लगभग 73,900 से 76,900 अंक के दायरे में ऊपर-नीचे होता रहा।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक बाजारों की कमजोरी ने भारतीय बाजार पर दबाव बनाए रखा।
RBI के नए नियमों का भी पड़ेगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई 2026 से लागू हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संशोधित बैंक गारंटी नियम आगे चलकर डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को प्रभावित कर सकते हैं।
अब पूंजी बाजार में कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए जारी होने वाली सभी बैंक गारंटी पूरी तरह कोलेटरल (Collateral) से सुरक्षित होंगी, जिसमें कम से कम 50 प्रतिशत राशि नकद (Cash Collateral) के रूप में रखनी होगी।
इस नियम का असर ट्रेडिंग फर्मों और स्टॉक ब्रोकर्स की कार्यप्रणाली पर भी दिखाई दे सकता है।
आगे क्या है बाजार की दिशा?
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले सप्ताहों में बाजार की दिशा कई अहम कारकों पर निर्भर करेगी।
- यदि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी जारी रहती है।
- मानसून सामान्य रहता है।
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली कम होती है।
तो इक्विटी कैश सेगमेंट में निवेशकों की भागीदारी फिर बढ़ सकती है और ट्रेडिंग वॉल्यूम में सुधार देखने को मिल सकता है।
निवेशकों के लिए सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा समय में निवेशकों को जल्दबाजी से बचते हुए मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए। वैश्विक घटनाक्रम, RBI की नीतियां, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां अगले कुछ सप्ताह तक भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करेंगी।
