ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय बॉन्ड बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है। मंगलवार को भारत के बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड लगभग स्थिर रही और महत्वपूर्ण 7 प्रतिशत स्तर के ठीक नीचे कारोबार करती दिखाई दी। निवेशक फिलहाल बाजार में बड़े दांव लगाने से बच रहे हैं क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द शांति समझौते की उम्मीद कमजोर पड़ती दिख रही है।
7% के करीब पहुंची 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड
27 मई की सुबह भारतीय 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 6.9970 प्रतिशत पर कारोबार कर रही थी, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 6.9943 प्रतिशत पर बंद हुई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तथा कच्चे तेल की कीमतें फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाती हैं, तो बॉन्ड यील्ड में और तेजी देखी जा सकती है।
ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ी बाजार की चिंता
स्थिति तब और जटिल हो गई जब ईरान ने अमेरिका पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास हमले कर युद्धविराम समझौते का उल्लंघन करने का आरोप लगाया।
हालांकि अमेरिका का कहना है कि अंतिम युद्धविराम समझौते को तैयार होने में अभी कुछ और दिन लग सकते हैं। इस अनिश्चितता ने वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ा दी है।
कच्चे तेल की कीमतों का असर
ब्रेंट क्रूड की कीमतें फिलहाल 100 डॉलर प्रति बैरल से थोड़ा नीचे हैं, लेकिन बाजार को डर है कि कीमतें फिर तीन अंकों में पहुंच सकती हैं।
ऊंची तेल कीमतों का सीधा असर भारत की महंगाई, चालू खाते के घाटे और बॉन्ड बाजार पर पड़ता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल की हर तेजी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाती है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी
मार्च से मई 2026 के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से लगभग 24 अरब डॉलर निकाले हैं। इससे रुपये और बॉन्ड बाजार दोनों पर दबाव बढ़ा है।
रुपया भी कमजोर होकर डॉलर के मुकाबले 95.75 पर खुला। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान संकट गहराता है तो रुपया फिर 96 के पार जा सकता है।
RBI की बैठक पर टिकी नजर
अब निवेशकों की नजर अगले सप्ताह होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर टिकी है। बाजार को उम्मीद है कि RBI महंगाई, विकास दर और कच्चे तेल के असर को लेकर महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद के बावजूद आयात पर निर्भरता रुपये पर लगातार दबाव बनाए हुए है।
