डॉलर के मुकाबले रुपया क्यों हुआ कमजोर? पाकिस्तान समेत कई एशियाई देशों की मुद्रा हुई मजबूत, जानिए वजह

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारत का जीडीपी ग्रोथ रेट कई बड़े देशों, यहां तक कि चीन से भी बेहतर माना जा रहा है। इसके बावजूद भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है और लगभग ₹96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है।

पिछले दो वर्षों में रुपये में करीब 14.75 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इस स्थिति को लेकर पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम सहित कई अर्थशास्त्रियों ने सवाल उठाए हैं। वहीं दूसरी ओर एशिया के कई देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले मजबूती दिखा रही हैं।

एशियाई देशों की मुद्राएं क्यों हो रही हैं मजबूत?

1. मलेशिया का रिंगिट

मलेशिया की मुद्रा रिंगिट पिछले सात वर्षों के सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच गई है। पिछले वर्ष रिंगिट में 9.25 प्रतिशत की मजबूती आई, जबकि इसी अवधि में भारतीय रुपया 4.40 प्रतिशत कमजोर हुआ।

रिंगिट की मजबूती के प्रमुख कारण:

  • करंट अकाउंट सरप्लस
  • 4.9 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में तेज़ वृद्धि
  • तीसरी तिमाही में 8.5 अरब रिंगिट का विदेशी निवेश
  • मुक्त व्यापार समझौते और मजबूत कूटनीतिक नीति

2. थाईलैंड का बाह्ट

थाईलैंड की मुद्रा बाह्ट जनवरी में प्रति डॉलर 31 के नीचे पहुंच गई, जो जून 2021 के बाद का सबसे मजबूत स्तर था।

मजबूती के कारण:

  • अमेरिका के साथ 51.3 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष
  • इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में तेज़ वृद्धि
  • करंट अकाउंट सरप्लस
  • स्थिर विदेशी मुद्रा प्रवाह

3. सिंगापुर डॉलर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्षेत्र में वैश्विक उछाल का सबसे बड़ा लाभ सिंगापुर को मिला है।

मुख्य कारण:

  • पहली तिमाही में 6 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि
  • नॉन-ऑयल घरेलू निर्यात में 24.5 प्रतिशत वृद्धि
  • इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 66.7 प्रतिशत की रिकॉर्ड बढ़ोतरी
  • पिछले पांच महीनों में सिंगापुर डॉलर करीब 1 प्रतिशत मजबूत

वर्तमान में 1 अमेरिकी डॉलर लगभग 1.28 सिंगापुर डॉलर के बराबर है।

4. पाकिस्तान का रुपया

जहां भारतीय रुपया इस वर्ष 6 प्रतिशत से अधिक कमजोर हुआ है, वहीं पाकिस्तान का रुपया पिछले छह महीनों में 1.31 प्रतिशत मजबूत होकर लगभग 278 प्रति डॉलर के स्तर पर बना हुआ है।

इसके पीछे प्रमुख कारण:

  • मार्च तिमाही में करंट अकाउंट सरप्लस
  • सऊदी अरब से वित्तीय सहायता
  • यूरोबॉन्ड बाजार में वापसी
  • निवेशकों का बढ़ता विश्वास

भारतीय रुपया कमजोर क्यों हो रहा है?

1. ट्रंप की टैरिफ नीति और वैश्विक तनाव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए अतिरिक्त आयात शुल्क और ईरान क्षेत्र में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है।

2. विदेशी निवेशकों की बिकवाली

मई के अंत तक विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 23 अरब डॉलर की निकासी की है।

इसका असर:

  • डॉलर की मांग बढ़ी
  • रुपये पर दबाव बढ़ा
  • करंट अकाउंट डेफिसिट को संतुलित करना कठिन हुआ

3. आयात पर अत्यधिक निर्भरता

भारत ऊर्जा और कच्चे तेल की जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। जब तेल महंगा होता है या डॉलर मजबूत होता है, तो रुपये पर अतिरिक्त दबाव आता है।


रुपये के कमजोर होने के नुकसान

महंगाई बढ़ती है

रुपया कमजोर होने पर आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • कच्चा तेल
  • एलपीजी गैस
  • उर्वरक
  • इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद
  • औद्योगिक कच्चा माल

इससे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।


रुपये के कमजोर होने के फायदे

निर्यात को मिलता है लाभ

कमजोर रुपया भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में सस्ता बनाता है, जिससे निर्यातकों को फायदा होता है।

रेमिटेंस बढ़ता है

विदेशों में रहने वाले भारतीय जब डॉलर भेजते हैं तो उन्हें अधिक रुपये मिलते हैं।

मार्च 2025 तक के एक वर्ष में भारत को 135 अरब डॉलर से अधिक का रेमिटेंस प्राप्त हुआ था।


केवल जीडीपी ग्रोथ से मजबूत नहीं होती मुद्रा

भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि केवल तेज़ आर्थिक विकास किसी मुद्रा को मजबूत बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होता।

मलेशिया, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों के पास:

  • करंट अकाउंट सरप्लस
  • मजबूत निर्यात
  • उच्च विदेशी निवेश
  • तकनीकी उत्पादों की वैश्विक मांग

जैसे कारक मौजूद हैं, जो उनकी मुद्राओं को समर्थन देते हैं।


भविष्य में रुपया मजबूत करने के लिए क्या करना होगा?

1. व्यापार घाटा कम करना

भारत को उच्च तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक्स और वैल्यू-एडेड उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देना होगा।

2. ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाना

ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश बढ़ाकर तेल आयात पर निर्भरता कम करनी होगी।

3. FII की बजाय FDI बढ़ाना

दीर्घकालिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करने के लिए निवेश-अनुकूल नीतियां बनानी होंगी, ताकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी का असर कम हो।

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