8 साल में 10 गुना बढ़ी लिथियम आयात, EV क्रांति से भारत की निर्भरता बढ़ी

भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर की तेज़ी से बढ़ती मांग अब देश की लिथियम आयात निर्भरता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रही है। पिछले आठ वर्षों में भारत की लिथियम आयात लागत लगभग 10 गुना बढ़कर 37,624 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरेलू बैटरी निर्माण और क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग की गति नहीं बढ़ी, तो आने वाले वर्षों में यह निर्भरता और गंभीर हो सकती है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के अप्रैल-फरवरी अवधि में भारत का लिथियम आयात बढ़कर 37,624.6 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2018 में यह आंकड़ा केवल 3,532 करोड़ रुपये था। इससे साफ है कि देश में इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी स्टोरेज सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ रही है।

EV बाजार की तेज़ रफ्तार बना मुख्य कारण

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सरकार लगातार कई योजनाएं चला रही है। इसी का असर है कि:

  • इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर और कारों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है
  • बैटरी स्टोरेज की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है
  • ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) की दिशा में भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है

विशेषज्ञों के मुताबिक, EV सेक्टर में बढ़ती मांग ने लिथियम-आयन बैटरियों की खपत को कई गुना बढ़ा दिया है, जिसके चलते आयात में भारी उछाल देखने को मिला है।

चीन पर बढ़ती निर्भरता बनी चिंता

भारत अभी भी लिथियम और बैटरी निर्माण से जुड़े कच्चे माल के लिए वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर है, जिसमें चीन की भूमिका सबसे बड़ी है।

उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि:

  • भारत में बैटरी निर्माण क्षमता अभी पर्याप्त नहीं है
  • अधिकांश बैटरी सेल और कच्चा माल आयात किया जा रहा है
  • वैश्विक सप्लाई चेन में किसी भी बाधा का सीधा असर भारतीय EV उद्योग पर पड़ सकता है

यही वजह है कि सरकार अब स्थानीय उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है।

सरकार की कई योजनाएं, लेकिन प्रगति धीमी

स्थानीय बैटरी इकोसिस्टम तैयार करने के लिए केंद्र सरकार ने कई बड़ी योजनाएं शुरू की हैं। इनमें शामिल हैं:

  • ₹18,100 करोड़ की Advanced Chemistry Cell (ACC) PLI Scheme
  • ₹34,300 करोड़ का National Critical Mineral Mission
  • ₹1,500 करोड़ की Critical Mineral Recycling Scheme

इन योजनाओं का उद्देश्य भारत को बैटरी निर्माण और क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग में आत्मनिर्भर बनाना है।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि ज़मीनी स्तर पर प्रगति अपेक्षा से काफी धीमी रही है।

50 GWh लक्ष्य अभी दूर

2021 में शुरू की गई ACC PLI योजना के तहत 50 GWh घरेलू बैटरी निर्माण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन अभी तक इस दिशा में सीमित सफलता मिली है।

रिपोर्ट के अनुसार:

  • Ola Electric ने 20 GWh लक्ष्य के मुकाबले केवल लगभग 1.5 GWh क्षमता शुरू की है
  • Reliance New Energy और Rajesh Exports जैसी कंपनियां अभी तक अपनी पूरी क्षमता संचालन में नहीं ला सकी हैं

बढ़ सकता है आयात बिल

विश्लेषकों का मानना है कि यदि EV अपनाने की गति इसी तरह जारी रही और घरेलू उत्पादन में तेजी नहीं आई, तो:

  • भारत का आयात बिल लगातार बढ़ेगा
  • विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ सकता है
  • रणनीतिक खनिजों के लिए बाहरी देशों पर निर्भरता और गहरी हो जाएगी

इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर लिथियम की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकता है।

रीसाइक्लिंग और घरेलू खनन पर जोर जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब:

  • लिथियम रीसाइक्लिंग
  • घरेलू खनन
  • बैटरी निर्माण
  • सप्लाई चेन स्थानीयकरण

पर तेजी से काम करना होगा, ताकि आने वाले वर्षों में आयात निर्भरता को कम किया जा सके।

भारत सरकार ने हाल ही में कई क्रिटिकल मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी प्रक्रिया भी शुरू की है, जिससे भविष्य में घरेलू सप्लाई मजबूत होने की उम्मीद है।

भारत के लिए क्यों अहम है लिथियम?

लिथियम को “सफेद सोना” भी कहा जाता है क्योंकि:

  • इसका उपयोग EV बैटरियों में होता है
  • Renewable Energy Storage में इसकी अहम भूमिका है
  • मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक्स में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है

आने वाले समय में लिथियम वैश्विक ऊर्जा अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण खनिज बन सकता है।

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